आंवला नवमी: इस विधि से करें स्नान और भोजन, कई जन्मों तक भोगेंगे पुण्य लाभ

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आमला (आंवला) नवमी (आंवला वृक्ष की पूजा परिक्रमा), आरोग्य नवमी, अक्षय नवमी, कूष्मांड नवमी के नाम से जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व कल यानि 9 नवंबर बुधवार को है। पुराणों के अनुसार अक्षय नवमी पर जो भी पुण्य किया जाता है उसका फल कई जन्मों तक समाप्त नहीं होता। इस दिन दान, पूजा, भक्ति, सेवा जहां तक संभव हो व अपनी सामर्थ्य अनुसार अवश्य करें। उसी तरह यदि आप शास्त्रों के विरूद्घ कोई काम करते हैं तो उसका पाप भी कई जन्मों तक किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ता है। ध्यान रखें, ऐसा कोई काम न करें जिससे आपकी वजह से किसी को दुख पहुंचे। आंवला नवमी के दिन सुबह नहाने के पानी में आंवले का रस मिलाकर नहाएं। ऐसा करने से आपके ईर्द-गिर्द जितनी भी नेगेटिव ऊर्जा होगी वह समाप्त हो जाएगी।सकारात्मकता और पवित्रता में बढ़ौतरी होगी। फिर आंवले के पेड़ और देवी लक्ष्मी का पूजन करें। इस तरह मिलेंगे पुण्य, कटेंगे पाप। अक्षय नवमी के अवसर पर आंवले के पेड़ की पूजा करने का विधान है। कहते हैं इस दिन भगवान विष्णु एवं शिव जी यहां आकर निवास करते हैं। आज के दिन स्नान, पूजन, तर्पण तथा अन्नदान करने का बहुत महत्व होता है। आंवले के पेड़ के नीचे झाड़ू से साफ-सफाई करें। फिर दूध, फूल एवं धूप से पूजन करें।  
इसकी छाया में पहले ब्राह्मणों को भोजन करवाएं फिर स्वयं करें।  पुराणों के अनुसार भोजन करते वक्त थाली में आंवले का पत्ता गिर जाए तो आपके भविष्य के लिए यह मंगलसूचना का संकेत है। मान्यता के अनुसार आने वाला साल सेहत के लिए तंदरूस्ती भरा होगा। आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने की प्रथा का आरंभ देवी लक्ष्मी ने किया था। आंवले की पूजा अथवा उसके नीचे बैठकर भोजन खाना संभव न हो तो आंवला जरूर खाएं।  चरक संहिता में बताया गया है अक्षय नवमी को महर्षि च्यवन ने आंवला खाया था जिस से उन्हें पुन: जवानी अर्थात नवयौवन प्राप्त हुआ था। आप भी आज के दिन यह उपाय करके नवयौवन प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्र कहते हैं आंवले का रस हर रोज पीने से पुण्यों में बढ़ोतरी होती है और पाप नष्ट होते हैं।

छठ पूजा के चार दिन जानें हर तिथि का महत्व और पूजन विधि...

नहाय खाय संग त्याग व तपस्या के महापर्व डाला छठ का शुभारंभ
इलाहाबाद: कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर फ्राइडे को नहाय- खाय से त्याग व तपस्या के पर्व डाला छठ का शुभारंभ हो गया। छठ पूजा के तहत व्रती महिलायें पूरे दिन उपवास रखकर पूजा की तैयारी में जुटी रहीं। मार्निग में पूजा के बाद घर में उदयाचल सूर्य को अ‌र्घ्य दिया, वहीं बड़ी तादात में महिलाओं ने गंगा व यमुना के पावन जल में डुबकी भी लगाई। इस दौरान स्नानार्थियों की भारी भीड़ के चलते हर घाट पर काफी चहल- पहल देखने को मिली। स्नान ध्यान के बाद महिलायें घर की साफ- सफाई में जुटीं।
उधर, शाम में स्नान बाद छठ मइया का ध्यान लगाकर पूजन किया गया। पूजा के बाद लौकी चने की दाल, कद्दू व नए चावल की खीर बनाकर उसका भोग लगाया गया। इसके बाद पूरे परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर उसे ग्रहण किया गया। डाला छठ के चलते व्रती महिलाओं के घर में लहसुन और प्याज का प्रयोग नहीं किया गया। पर्व पर घर में शुद्ध व सात्विक भोजन ही बनाया जाता है. इधर, डाला छठ के दूसरे दिन सैटरडे को खरना होगा। इसमें व्रती महिलाएं दिन में उपवास रखकर भजन- कीर्तन करेंगी। साथ ही चावल व नए गुड़ से खरना बनाया जाता है। इसे छठ मइया को चढ़ाया जाएगा। फिर शाम में गन्ने के रस की खीर बनाकर उसे पांच मिट्टी के बर्तनों में रखा जाता है और पूजा व हवन करके उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यहीं से 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत भी आरंभ होगा। मंडे को उगते सूर्य को अ‌र्घ्य देने के बाद इसकी समाप्ति होगी.
कार्तिक कृष्णपक्ष की षष्ठी रविवार को छठ का प्रमुख व्रत होगा। इसमें छठ मइया की विशेष पूजा अर्चना की जाएगी। इस दरम्यान व्रती महिलायें निर्जला व्रत रखकर शाम में डूबते हुये सूर्य को अ‌र्घ्य देंगी। महिलायें बाजे की धुन पर मांगलिक गीत गाते हुए गंगा या यमुना घाट तक जाएंगी। उनके साथ घर के पुरुष सिर पर टोकरी रखकर चलेंगे। टोकरी में सूप, जलता दिया, केला गन्ना, मूली, अमरूद, खरना इत्यादि रखा जाएगा। वहीं घाट पर पहुंचकर गन्ने के 12 पेड़ का मंडप बनाया जायेगा। जिसमें व्रती महिलायें पूजा करती हैं। इसके बाद पूरी रात घाट पर ही बिताया जायेगा और मंडे मार्निग उगते सूर्य को अ‌र्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा. डाला छठ के मद्देनजर बाजारों में अच्छी खासी रौनक देखने को मिली। फल की दुकानों में महिलाओं की भारी भीड़ जुटी रही। जगह- जगह गन्ने के ढेर दिखने शुरू हो गए हैं। बांस की बनी टोकरी और सूप आदि की जमकर खरीददारी हो रही है। सूप, जलता दीपक, केला, गन्ना, मूली, अमरूद, खरना, सिंदूर सहित पूजा की प्रत्येक सामग्री रखकर घाट तक ले जाने की परंपरा है।

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