गणतंत्र दिवस परेड में बंगाल की झांकी शामिल नहीं किए जाने पर भड़कीं ममता

सीएम ममता बनर्जी बोलीं- गणतंत्र दिवस की झांकी के लिए हमारी थीम की गई रद्द कोलकाता : दिल्ली के राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड के दौरान विभिन्न राज्यों की निकलने वाली झांकियों में पश्चिम बंगाल की झांकी को शामिल नहीं किए जाने से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को पार्क स्ट्रीट में क्रिसमस पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने के दौरान इस मुद्दे पर अपना क्षोभ व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार जान-बूझकर बंगाल की उपेक्षा कर रही है। गणतंत्र दिवस समारोह की आयोजन समिति की ओर से अब तक सरकार को इस बारे में कोई सूचना नहीं दी गई है। गणतंत्र दिवस पर समारोह में राज्यों की झांकियां शामिल करने के मुद्दे पर कई बैठकें हो चुकी हैं लेकिन केंद्र ने एक भी बैठक में राज्य सरकार को आमंत्रित नहीं किया। इससे साबित होता है कि इस बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए बंगाल के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बंगाल ने इस बार अपनी झांकी का थीम 'एकता व सौहार्द' रखा है। शायद केंद्र सरकार को यह पसंद नहीं है। केंद्र सरकार-जाति धर्म के नाम पर भेदभाव करती रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे पहले 2013 व 2014 को गणतंत्र दिवस परेड में बंगाल की झांकी को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। 2015 में उन्होंने कन्याश्री पर आधारित झांकी को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। केंद्र ने जिस कन्याश्री को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल करने से इन्कार किया, उसी को यूएनओ के कार्यक्रम में वैश्विक स्तर पर पुरस्कृत किया गया। इससे साफ जाहिर होता है कि केंद्र सरकार जान-बूझकर बंगाल की उपेक्षा करती है। उधर राज्य सचिवालय नवान्न सूत्रों के मुताबिक गणतंत्र दिवस परेड में अन्य राज्यों को झांकियां शामिल करने लिए केंद्र ने अनुमोदन दे दिया है लेकिन बंगाल सरकार को इस बारे में अब तक कोई सूचना नहीं दी गई है।

चीन को भारत की और भारत को चीन की जरूरतः दलाई लामा

कोलकाता। लंबे समय तक तिब्बत की आजादी पर जोर देने वाले तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के विचारों में नरमी दिखाई दी है। गुरुवार को यहां आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "तिब्बत चीन से आजादी नहीं चाहता बल्कि ज्यादा विकास चाहता है। चीन और तिब्बत के बीच करीबी संबंध रहे हैं। यदा-कदा संघर्ष भी हुआ है। इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित कार्यक्रम में दलाई लामा ने ये बातें कहीं। दलाई लामा ने कहा, "अतीत बीत गया है, भविष्य पर ध्यान देना होगा। तिब्बती चीन के साथ रहना चाहते हैं। हम स्वतंत्रता नहीं मांग रहे हैं। हम चीन के साथ रहना चाहते हैं। हम और विकास चाहते हैं।" दलाई लामा ने कहा कि चीन को तिब्बती संस्कृति और विरासत का अवश्य सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा, "तिब्बत की अलग संस्कृति और एक अलग लिपि है। चीनी जनता अपने देश को प्रेम करती है। हम अपने देश को प्रेम करते हैं।" तिब्बतियों के धर्मगुरु ने कहा कि कोई भी चीनी इस बात को नहीं समझता है कि पिछले कुछ दशकों में कुछ सालों में देश बदला है। चीन के दुनिया के साथ शामिल होने के मद्देनजर इसमें पहले की तुलना में 40 से 50 फीसदी बदलाव हुआ है। बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत के पठार का पारिस्थिकीय महत्व भी है। चीन के पर्यावरणविदों ने इसे समझा था और कहा था कि इसका दक्षिण ध्रुव व उत्तरी धु्रव जितना ही पर्यावरणीय महत्व है। पर्यावरणविद् इसे "तीसरा ध्रुव" बताता है। यांगत्जी से लेकर सिंधु नदी तक बड़ी नदियां तिब्बत से निकली हैं। अरबों लोग इससे जुड़े हैं। तिब्बत के पठार का खयाल रखना न केवल तिब्बत के लिए बल्कि अरबों लोगों की दृष्टि से भी अच्छा है। दलाई लामा ने कहा कि चीनियों की तुलना में भारतीय ज्यादा आलसी हैं, शायद मौसम इसकी वजह है। लेकिन भारत बहुत स्थिर देश है। यह विविध परंपराओं वाले लोगों को जीता-जागता उदाहरण है। गौरतलब है कि तिब्बत से निर्वासित नेता दलाई लामा को भारत ने शरण दे रखी है। चीन इसका विरोध करता रहा है। दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं।

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