पुलिस के लिए गले की फांस बनी प्रताप की मौत

अ.हि.ब्यूरो सम्भल। पहले पुलिस कस्टडी से भाग निकलने और अगले ही दिन आरोपी की उसी के घर में फांसी के फंदे पर झूलती लाश मिलने से पुलिस के लिए यह गुत्थी किसी रहस्य से कम नही है। मृतक के परिजनों का आरोप है कि पुलिस प्रताडना से प्रताप की कस्टडी मे मौत हो जाने के बाद कानूनी दावपेच मे फंसने से बचने के लिए रात को किसी वक्त घर पर फांसी पर लटका कर पुलिस ने हत्या को आत्महत्या मे दर्शाने की कोशिश की, ताकि सांप भी मर जाए लाठी भी नही टूटे। हालाकि पुलिस ने स्वीकार किया है कि आरोपी को उसके घर से गिरफतार कर कोतवाली लाया गया था , और किसी वक्त मौका पाकर वह  कोतवाली से भाग निकला। यहां बडा सवाल पैदा होता है कि जिस आरोपी युवक पर पहले से ही दर्जन भर अधिक मुकदमे थानो मे दर्ज है और उसे पकडने के लिए काफी समय से नजर रखे थे, वही हिस्ट्रीशीटर पुलिस कस्टडी से इतनी आराम से भाग निकला कि पुलिस को आभास तक नही हुआ। अगर मृतक के परिजनों की बात पर यकीन किया जाए तो पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे है। आखिर पुलिस ने एक हिस्ट्रीशीटर को इतने आराम से कैसे भाग निकलने का मौका दे दिया। अभी तक की जांच पडताल में मृतक के परिजन भी संदेह के दायरे मे आ रहे है। क्योंकि परिजनो के मुताबिक पुलिस प्रताप को यातना देने के बाद मौत होने पर घर मे फांसी पर लटकाकर चली गई। वही सवाल खडा  होता है कि जिस कमरे मे लाश लटकी थी, उससे लगभग 15 फिट की दूरी पर मृृतक की बीवी पिंकी व सात वर्षीय भाई शोभित सो रहा था, जबकि आंगन मे बूढे मां बाप सोए थे।  पुलिस अगर मृतक को उसके घर फांसी पर लटकाकर गई थी, तो परिजनों को जरा भी आहट नही हुई। वही पुलिस आत्महत्या करना बता रही है, अगर पुलिस की बात सही है तब मृतक के हाथ व पैर पीछे किसने बांधे, क्योकि फांसी पर झूलते वक्त कोई भी अपने हाथ पैर पीछे  नही बांध सकता। अगर पुलिस व परिजन झूठ बोल रहे है तब प्रताप की मौत कैसे हुई, क्या किसी तीसरे ने उसे मारा, या उसकी किसी से रंजिश थी। पुलिस इन सब बिदुओं पर जांच करने मे जुटी है।

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